एक वो, और बस वो, वो ही रही…

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प्रतीकात्मक तस्वीर, सौजन्य गूगल

कहते हैं आपने कुछ नहीं करना है तो इश्क़ कर लीजिये सारी चीजें  सुहानी लगनी लगेगी। इसके शिकंजे में आते ही आप को लगने लगेगा की आख़िर सुबह इतनी जल्दी क्यों हो जाती हैं। जिओ का सहारा हो और साथ में मेहबूब जो जान से भी ज्यादा चाहती हो, ऐसे में आपको एक मेहनतकश इंसान बनने से कोई रोक नहीं सकता। रातें छोटी लगने लगेगी। बाहर बैठे चौकीदार एक पल को कामचोरी कर पलक झपका लेगा (यहाँ तात्पर्य चोर-वाले वे चौकीदार से कत्तई नहीं हैं) लेकिन, क्या मजाल आपकी आँखे मोबाइल की स्क्रीन से टस से मस हो जाएँ।

शायद इसे ही मोहब्बत कहते हैं। खैर एक दिन हुई फ़ोन पर बातचीत ने मानो दीवाना बना दिया था। जिस तरह तनाव से पीड़ित ढर्रा (रास्ता) भुला राही ठर्रे (शारब की दुकान) पर नज़र आता है ठीक उसी प्रकार से मैं भी प्यार के नशे में धुत्त होकर उसकी मखमली आवाज सुनने की राह तकता रहता। निर्धारित प्लान के तरह सुबह साढ़े नौ बजे फ़ोन की रिंग बजाता फिर ढेरों बातें होती। फिर दोपहर के 2बजे नितक्रमानुसार वही क्रिया दोहराई जाती। काम में तन लगा था लेकिन मन तो कही किसी स्टेशन जाने की राह तक रहा था। इसी चक्कर में कई बार कई गलतियां कर बैठा। खैर शाम को ऑफिस से छूटने के बाद तो मानो रात अपनी ही गुलामी करने के आतुर नज़र आती थी।

एक बार जब फ़ोन लग जाता और बातें शुरू होती, बातें भी इतनी लम्बी-लम्बी की घड़ी की सुइयां भी शर्मा जाती। अचानक दाहिनें हाथ की कलाई में बंधी घड़ी पर नज़र पड़ती, मानो दिल को एक शुकुन मिलता की अभी तो रात के ग्यारह ही तो बजे हैं। न तो उधर से फ़ोन काटने का मन होता और  न ही इधर से, यहाँ तो मानो दुनिया की सारी खुशियां ही उस छोटे से फ़ोन में समाहित थी। इस बातचीत को एक आध बार नेटवर्क की क्रूरता का भी शिकार भी होना पड़ा।

फ़ोन से संपर्क टूटने पर पल भर के लिए दिल को झूठी तस्सल्ली देकर समझा लेता कि हो सकता हैं उसके फ़ोन की बैटरी दग़ाबाज़ निकल गई हो। लेकिन अगले ही पल जैसे ही मेरे फोन की लाइट चमचमा उठती तो मानो ऐसा लगता संसार की सारी खुशियां मिल गयी हो और फिर जुट जाते उसी कर्म में, फिर यही सोचते कि अब बात तो तभी खत्म होगी जब-तक मोबाइल दम न तोड़ दें।
वैसे प्यार में शर्त और स्वार्थ की कोई जगह नहीं होती। जहाँ इन दोनों बहनों (शर्त और स्वार्थ )ने अपना घर बना लिया, समझों प्यार की अर्थी निकलने का वक़्त आ गया हैं। मैं इन दोनों से दूर रहना चाहता था और कोशिश भी यही थी। कई दिनों की लगातार हुई बात-चीत में एक बात तो साफ़ तौर झलक रहीं थी कि बात तो बस ही अभी ही बस शुरू ही हुई हैं। अभी तो पूरी भागवत सुनी जानी हैं।
कभी ऐसा लगा ही नहीं कि उससे बहुत दिनों से बातें हो रही हैं। ऐसे लगता मानो आज ही पहली बार मुलाक़ात हुई है। पहली मुलाक़ात के नशे को ज़िन्दगी भर बरकरार रखना चाहता हूँ। यक़ीनन कभी ये अहसास ही नहीं हुआ की मुझे खुशियों की बम्पर लॉटरी लग गयी हैं। पहले बहुत कुछ हो कर भी कुछ नहीं होने का एहसास हुआ करता था लेकिन अब तो सब कुछ लुटा कर भी बहुत कुछ होने का एहसास होने लगा हैं। कभी-कभी तो ऐसे प्रतीत होता कि मानो इस कायनात में एक वो ही हैं जिसके सहारे सांसे चल रहीं हैं। हालत, तो लुटी हुई सल्तनत के उस बादशाह जैसे थी जो फकीरी में भी महलों के ख्वाब देखा करता था।

वो थी ही ऐसी, एक बार सोचा साक्षात दर्शन क्यों न किया जाएँ। बहुत सुन चुकी बातें। तस्वीरें तो आजकल नज़रों को धोखा देने के लिए ही होती हैं, स्मार्ट फ़ोन के स्मार्ट कैमरे से ली गयी किसी भी लड़की की तस्वीर में वो खुद मैरीलीन मोनरो (अमेरिकन अभिनेत्री) से कम नज़र नहीं आती। तस्वीरों को तो आप नज़रों का धोखा कह सकते हैं।इसलिए अन्ततोगत्वा वीडियो कॉल करने का जोखिम उठाने का मन बनाने लगा। लेकिन फिर मन में विचार हिचकोले लगाने लगा, अगर वो उस कसौटी पर खरी नहीं उतरी तो क्या होगा ?क्या ये सारा का सारा प्यार महज कोरी कल्पना तक सीमित ही रह जायेगा। क्या होगा अगर वो उस पैमाने के आस-पास भी नहीं पहुँच सकी तो ?…To be continue….

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