क्या प्यार को नसीब के सहारे छोड़ देना चाहिए?

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प्रतीकात्मक तस्वीर, सौजन्य गूगल

सहसा फ़ोन की घँटी बजी ही थी और मैंने फ़ोन उठाते ही जैसे कान पर लगाया, दूसरी तरफ से आवाज़ आई, “सब खत्म हो गया है साहब, आपने ने मेरे विश्वास को तोड़ा है। क्या कमी थी मुझमें जो आप उस सात समंदर पार बैठी गोरीमेम के लिए अपना मोह नहीं छोड़ पाए। आप अपनी ईमानदारी का दावा करते थे, क्या हुआ आपकी गुलामी का।” अक्सर वो एक बात कहा करती थी कि “विश्वास में पहला शब्द ही विष होता है उसके बाद आस होती है।”

आस के विष को पीना यानी विश्वास करना होता है। वो मुझे प्यार से साहब कहती है। मैं क्षुब्द , चित को शांत किए आंखों में बेबसी, करुणाभरे कंठ से कुछ बोलने का प्रयास करता कि मेरी अपनी ग़लती और बेवकूफ़ी आँखे लाल किए मुझे ही घेर लेती, यह वक़्त सफाई देने का नहीं था। गलती तो हुई थी मुझसे, लाज़मी है इस गलती की सजा मुझे ही भुगतनी थी। ख़ैर इन सब के बीच मेरा विश्वास अड़िग था कि “चाहे कुछ भी हो उसे मना लूंगा।”
अपनी गलतियों को मान चुका था लेकिन कहते हैं ना कि सच्चे प्यार में सब बर्दाश्त किया जा सकता है सिवाय धोखे के। बशर्ते मैं हर कीमत चुकाने को तैयार था। लेकिन वो थी कि किसी भी कीमत पर सुनने को तैयार नहीं थी। उसके हठयोग के सामने कोई तरक़ीब, कोई मंतर, कोई जुगाड़ ना ही कोई सिफ़ारिश काम के लायक थी। इसी बीच सहसा उसे भी इस बात का आभास था कि इतनी आसानी से इसे छोड़ा नहीं जा सकता लेकिन सबक सीखना भी जरूरी था उसे। खैर, मैं बुरी तरह डर गया था। ऐसा नही था कि मुझे लड़की दूसरी नहीं मिलती या उसे लड़का दूसरा नही मिल सकता था लेकिन जो बॉन्डिंग रही दोनों के बीच, जो प्यार था। वो शायद नहीं मिल पाता।

कहते हैं चोट खाये प्यार की कसक बहुत होती हैं। मैंने भी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बदौलत उससे माफ़ी मांगी, कई मर्तबा, मिन्नतें की लेकिन सब व्यर्थ। उसने अपना अटल फ़ैसला कर लिया था। उसका कहना था कि शादी के बाद रोने से बेहतर है अभी रो लो, बाद में ज़िंदगी भर पछतावा तो नहीं रहेगा। मुझे इस बात का मलाल था कि उस बात की इतनी बड़ी सजा दी जा रही है जो एक मामूली सी बात थी, लेकिन कहते हैं ना साहब, जब तूफान का रुख आपकी ओर हो तो उसके खिलाफ ही चलना चाहिए तभी आप उसे चीरते हुए आगे बढ़ सकते हो अन्यथा आप भी उसके बहाव में बह जाएंगे।

इस बीच कुछ असर ना होता देख मैं भी हार मान चुका था। एक पल लगने लगा , शायद यहीं इस पवित्र प्यार का अंत है। नीयति अपना फैसला कर चुकी थी। मैं अपनी नीयत का साफ था लेकिन नीति कुछ और ही थी। इस बीच मान-मनौव्वल में ही उस दिन कब घड़ी में दोपहर के 3 बज गए पता ही नही चला। आखिरी बार तक मैं गुज़ारिश करता रहा, सब बेअसर थी। इस बीच दूसरी तरफ से यह बोल कर फोन बेदर्दी से काट दिया गया कि “आज के बाद शाम को फ़ोन मत करना , ना ही मैं आपको फ़ोन करूंगी।” इतना सुनते ही मानो मेरे दिल की धड़कने तेज़ हो चली।

एक तो काम की टेंशन ऊपर से इस भयंकर समस्या को पार पाना मानो किसी सजायाफ़्ता कैदी अचानक से सजाए मौत का फरमान जारी हो जिसके आगे अदालती कार्रवाई भी नदारद थी। कोई आस नहीं बची थी इस रिश्ते को बचाने की। सब खत्म मानकर मैं भी ऑफिस की तरफ बढ़ चला उस दिन दोपहर के खाने में बातें खाकर ही आत्मा तृप्त हो चुकी थी। अब सब खत्म था, बस इंतज़ार था शाम होने का। 4 घंटे का समय मानो 4 दशक लगने लगा था। जैसे तैसे घड़ी की सुईयां हमारे देश मे हुए विकास की तरह आगे बढ़ रही थी। मैं सात बजने का इंतज़ार कर रहा था कि एक आखिरी दांव चला जाए कि शायद यह कारगर साबित हो।

घड़ी में शाम के सात बजे चुके थे, आफिस से निकलते ही सोचा कि क्या वो दोबारा फ़ोन करेगी या नही? इसी कशमश में मैंने देर ना लगाते हुए उसे फ़ोन कर लिया। घंटी बजी काफ़ी देर तक रिंग बजने कब बाद उसने फ़ोन उठाया। कुछ देर रुखे स्वर से बोली बाद मैं पता नहीं क्या हुआ क्यों हुआ इस बात से तो मैं भी अंजान था। उसने मुझे यह कहते हुए माफ कर दिया था कि अगर तुम मेरी क़िस्मत में होंगे तो तुम्हें मुझसे कोई छीन नहीं सकता और यदि नहीं होगे तो कोई मिला नहीं सकता। अब तो बस इस प्यार को नसीब के सहारे अनाथ छोड़ दिया गया हैं। देखते हैं कि हमारा मुक़द्दर क्या गुल खिलाता हैं?

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