बेस्ट प्रशासन की अनदेखी के चलते गैरक़ानूनी गतिविधियों और अवैध पार्किंग के मकड़जाल में फंसा बांद्रा स्थित 315 बस स्टॉप

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वैसे तो देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कानून व्यवस्था चाक चौबंद होने का दावा मुम्बई पुलिस द्वारा किया जाता रहा हैं। लेकिन, मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित 315 बस स्टॉप कहने के लिए तो एक बस स्टॉप है, बस की कैंटीन बनी हुई है। लोगों की माने तो पिछले 3 वर्षों से बस की आवाजाही बंद है जिसके चलते रिक्त स्थान पर अवैध पार्किंग एवं अन्य ग़ैरकानूनी गतिविधियों का मकड़जाल अपना पैर पसार रहा है। आये दिन शराबियों, गरदुल्लों को अपनी रात्रिक्रिया करते देखा जा सकता है। 315 बस स्टॉप से सटे गैरेज, कार वाशिंग सेंटर और अवैध निर्माणकर बनाई गई दुकानों को देखा जा सकता है। कार्रवाई के नाम पर स्थानीय खेरवाड़ी पुलिस स्टेशन के एक्के दुक्के कांस्टेबल रविवार के दिन अपनी हथेली गरम करने आ जाते है और जेब गर्म होते ही चले जाते हैं।

आखिर क्या कारण है जो 315 बस स्टॉप पर पुलिस एक्शन नहीं लेती?

खैर शिकायत के नाम पर सरकारी उदासीनता, बेस्ट प्रशासन की घोर लापरवाही और स्थानीय दबंगो के चलते किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा रही। स्थानीय लोगों की माने तो शराबी आएदिन हुड़दंग और गाली गलौज करते है। सूत्रों की माने तो खेरवाड़ी पुलिस के कांस्टेबल कार्रवाई करने के बहाने अवैध पार्किंग में खड़ी गाड़ियों की हवा निकालने , जबरजस्ती चाभी निकालने, वाहन चालकों से मर्यादाविहीन शब्दों के साथ-साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करते है। नाम न बताने की शर्त पर एक ड्राइवर ने बताया कि पुलिस कानूनी कार्रवाई करने के नाम पर हम पर हाथ उठाती है और परप्रांतीय होने के चलते अभद्रतापूर्ण व्यवहार करती हैं। यही नहीं स्थानीय पत्रकार के साथ भी अभद्रता पूर्ण व्यवहार भी करती हैं खेरवाड़ी पुलिस। एक अन्य ड्राइवर ने कहा कि पुलिस लोगों से हफ्ता लेती है जिसके कारण उनपर कोई कार्रवाई नहीं करती।

क्या पुलिस को गाड़ी की चाभी और टायर की हवा निकलने का हक है? 

रही बात अवैध पार्किंग की तो उसपर पुलिस चालान कर सकती हैं। कानून के मूताबिक उचित कार्रवाई होनी चाहिए लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्या कानूनी कार्रवाई के नाम पर गाड़ी के टायर की हवा निकलना, अभद्रतापूर्ण व्यहार करना और परप्रान्ती होने के चलते ताना मारने की इजाजत कानून देता हैं? एक तरफ जहां देश के प्रधानमंत्री सवा सौ करोड़ भारतीयों की बात करते है तो वही खेरवाड़ी पुलिस के कांस्टेबल परप्रांतीय द्वेष के चलते गरियाते है। माना कि कानून की रक्षा का भार पुलिस के फौलादी कंधों पर होता है, परंतु कानून का उचित पालन करना पुलिस का कर्तव्य है ना की लोकतांत्रिक देश में जनता की आवाज को दबाना। ऐसे में  देश के लोकतंत्र पर प्रश्नचिन्ह निर्माण होता हैं कि क्या क्या वाकई में लोकतंत्र के नाम पर जनता का शोषण होने लगा है?  ऐसे में पुलिस को चाहिए कि मर्यादाविहीन शब्दों का प्रयोग न करें और दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करें।

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