रूहानी इश्क़ के जकड़ में कुछ इस तरह जकड़े कि खुद की फिक्र भी करना छोड़ दिए

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सौजन्य :- गूगल

अपने आप को सुकून देने के लिए आख़िरकार मैंने फ़ोन लगा ही दिया। कुछ देर बाद अचानक से आवाज़ सुनाई दी, “हेलो कैसे हो आप” ? मैंने उत्सुकता वश कहा , “मैं ठीक हूँ। बड़ी देर से फ़ोन लगाने का मन कर रहा था। सोचा थोड़ी गुप्तगू कर लूं।” इस तरह बातों का सिलसिला एक बार जो चल पड़ा तो फिर कहाँ रुकने का नाम। तकरीबन घंटो चली बात के बाद उसने आखिरकार मुझसे पूछ ही लिया, “मैं पसंद तो हूँ न आपको, मेरा रंग गेहुंआ हैं, आप मुझसे साफ हो, गोरे हो, कल आपके परिवार वाले आपको कहेंगे कि किसे लाया, कैसे पसंद कर लिया।”

इस तरह के अनगिनत सवालों की बौछार होने लगी, कुछ देर मानो मैं स्तब्ध होकर सुनता रहा। पहले तो मुझे हंसी आई उसके मासूमियत पर, हो भी क्यों हर लड़की चाहती है कि वो सुरक्षित रहे। उसकी वजह से उसके होनेवाले पति को खरी खोटी ना सुनना पड़े। अभी उसके तरकश से प्रश्नों के तीर एक के बाद एक मुझपर बरस ही रहे थे कि मैं सहसा कह उठा, “सुनो मैंने आपके रंग-रूप , गढ़न से प्यार नहीं किया, यह कोई जिस्मानी इश्क़ नहीं है यह रूहानी है। रूहानी इश्क़ शक्ल सूरत नहीं देखता। जिन्हें खूबसूरती देखनी हैं वो बाजार से आईना खरीद सकते हैं। हमें शक्ल नहीं देखनी, हमें आपकी मखमली आवाज़ से प्यार हैं ना कि आपकी सूरत से। अगर आप के चेहरे पर एसिड भी गिरा होता तब भी मैं आपसे उतना ही प्यार करता जितना पहले दिन से करता हूँ।”

मेरा यह जवाब उसे सुकून देने वाला था। उसे एक पल लगा शायद वो झूठ बोल रहा है। भावनाओं के आगोश में आकर इस तरह की बेकार की बातें कर रहा है। भला कोई इस कदर किसी को क्यों चाहेगा ? विश्वास उसे था तो मुझपर, परंतु उसके मन में शंका घर कर गई थी। बार-बार मिलने की जिद्द करने लगी। वो अक्सर फ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान एक ही बात कहती कि “एक बार मुझसे मिल लो, देख लो, हो सकता है देखने के बाद आपका मन बदल जाए। आप अपना ईरादा बदल दें।” इन बातों से अक्सर मुझे गुस्सा आता परंतु उसका प्यार ही था जो मुझे हर बार रोक लेता। हालांकि मैं भी समझ नहीं पा रहा था कि आखिर वो चाहती क्या है ? इस तरह महीनों हुई लंबी बातों का मैं निष्कर्ष नहीं निकाल पा रहा था। यह पता लगा पाना बेहद मुश्किल था कि कहीं हम दोनों भ्रम के साए में तो नहीं जी रहें हैं।

आखिर क्या कारण था जो उन्हें गुमराह किये हुए था। क्या मेरे प्यार में कोई कमी रह गयी थी ? या फिर हद्द से ज्यादा चाहने की सजा के तौर पर मुझे खिजाने की कोशिश की जा रही थी। इस बात को लेकर कई बार नोंकझोंक भी हुई। मलाल भी हुआ कि इस तरह नहीं करना चाहिए था। खेद दोनों तरफ था। इज्जत एक दूसरे की दोनों करते थे। जरा सी नाराज़गी का आभास होने पर एक दूसरे से माफ़ी मांगने की होड़ दोनों तरफ से थी। अपनी गलती ना भी होने पर अंग्रेजी की पांच वर्णों वाले शब्द “SORRY” कहकर मामला सुलझाने की कोशिश भी होती। नाराज़गी दूर भी कई मर्तबा हुई। इस तरह तक़रीबन तीन महीनें बीत चुके थे। नब्बे दिनों के इस प्यार ने बहुत कुछ सिखाया था।

फिर एक दिन अचानक वो हुआ जिसकी कल्पना नहीं थी। जो सोच के परे था। जिसे सोचने मात्र से सिरहन दौड़ पड़ती। आखिरकार वो दिन आ ही गया जहां से इस प्यार का आगाज़ हुआ था वहीं आकर इसे एक मोड़ दिया जाए। वो बवंडर आखिरकार आ ही गया जब लगा कि अब इस सुनहरे प्यार का अंत ही है….लेकिन वो वजह क्या थी जिसके कारण शादी के पहले ही तलाक की नौबत आई…..To be Continue……

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