रानी पद्मावती का इतिहास

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हमारे राष्ट्रीय जीवन का मूल्य, राष्ट्रीय आदर्श और राष्ट्रपुरुष कौन होने चाहिए, इस संकल्पना की स्पष्टता के बाद अब हम सभी भारतीयों को  इतिहास में जिजामाता, अहिल्याबाई होळकर, रानी लक्ष्मीबाई, भगिनी निवेदिता, सावित्रीबाई फुले, रानी मा गाइदिन्ल्यू यह सभी प्रातः स्मरणीय और पूज्यनीय है जिन्होंने देश ,धर्म और अपने कर्तव्य के लिए जीवन यापन किया.

इसी प्रकार अपने देव, देश और धर्मरक्षा के लिए अपने पर्णो की आहुति देकर बलीदान का अदारसब स्थापित करनेवाली चितौड़ की महारानी पद्मिनी (पद्मावती) का इतिहास हम जानेंगे.

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क्या है पद्मावती का इतिहास
सुल्तानी परंपरा के अनुसार अपने चाचा और ससुर और दिल्ली की गद्दी पर खिलजी राजवंश संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी का कपट और अतिशय क्रूर तरीके से खून कर उसके सिर को भाल की नोक में घुसाकर उसे पूरे सेना में घुमाकर, उसके बाद अपने भाई और साले के मारकर 21ओकटुबेर 1296 रोजी अल्लाउद्दीन खिलजी दिल्ली की गद्दी पर बैठा. सत्ता के लिए अल्लाउद्दीन ने भारत के राज्यो पर आक्रमण कब्जा करने का सत्र शुरू किया.

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किन किन राज्यो पर किया  ख़िलजी ने हमला?

चितौड़(ई.स.1303),गुजरात(1304),रणथम्बोर(1305),मालवा(1305), सिवाना(1308), देवगिरी(1308), वारंगल(1310),जलोर(1311), द्वारसमुद्र(1311) आदि राज्यो पर आक्रमण कर अल्लाउद्दीन ने परमार, वाघेला, चौहान, यादव, काकाटिय, होयसल, पांडेय आदि के साम्राज्य को उध्वस्त किया.

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इतिहासप्रसिद्ध अल्लाउद्दीन खिलजी

अल्लाउदीन ने हजारों का नरसंहार किया, लाखो को का धर्मपरिवर्तन करवाया, करोड़ो की संपत्ति एवं हटी घोड़ो की लूट की और कई माताओ बहनों की इज़्ज़त लूट कर उन्हे ग़ुलाम बनाकर बाजार में बेचने के लिए खड़ा कर दिए.

शैतानो को भी शर्म आ जाये इतने अत्याचार इस खिलजी ने भारत पर किए है. ऐसा है यह इतिहास प्रसिद्ध “अल्लाउद्दीन खिलजी”

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कौन थी पद्मावती?

अल्ल्लाउदीन जब दिल्ली की गद्दी पर बैठा था उस समय मेवाड़ में रावल वंश के राणा रतनसिंह गद्दी पर बैठे थे और चितौड़गढ़ उसकी राजधानी थी. और रति की तरह अद्भुत, शीशे की तरह पारदर्शी , सुंदरता में सबको मात दे ऐसी थी मेवाड़ की महारानी पद्मावती. सिंहली(श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेन और रानी चम्पावती की रूपसुन्दरी राजकन्या पद्मावती बचपन से ही युद्धकौशल में निपुण थी. उनका स्वयंवर भी अलग था उसमें यह शर्ते थी कि लड़ाई के लिए वह जो सैनिक चुनेंगी उससे हरनेपर ही वह उनसे विवाह करेंगी. और वह चुना हुआ सैनिक कोई और नही खुद रानी पद्मावती ही थी. इस प्रकार रतनसिंह ने रानी पद्मावती को जीतकर पद्मावती से विवाह किया.रतनसिंह अपने प्रजाहित के राज्यकरभर के लिए और पद्मावती अपनी सुंदरता के लिए विख्यात थी.

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कैसे जागी  ख़िलजी को पद्मावती को पाने की लालसा?

रतनसिंह के दरबार मे राघव चेतन नामक एक कलाकार था. किसी गुनाह के लिये रतनसिंह ने राघव को अपमानित कर दरबार मे से निकाल दिया. राघव चेतन के अंदर अपमान की ज्वाला भभक रही थी वह जाकर दिल्ली के एक राज्यवन में जाकर बैठ गया. खिलजी रोज की तरह वह शिकार के लिए आता था.एक दिन खिलजी निशाना लगा रहे थे तभी राघव चेतन एक सुंदर बाँसुरी बजाने लगा. बाँसुरी की धुन सुन खिलजी ने उसे अपने सामने उपस्थित करने का उपदेश  दिया.

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उस समय राघव चेतन ने रानी पद्मावती का रसभर वर्णन करते हुए कहा कि, “तुम्हारी तरह पराक्रमी पुरुष के जनानखाने में पद्मिनी का न होना तुम्हारे पराक्रम का अपमान है” यह सुनकर खिलजी के मन मे पद्मावती को पाने की जिज्ञासा और लालच जागृत हुई. फिर पद्ममवती के लिए खिलजी ने जनवरी 1303 में चितौड़गढ़ पर चढ़ाई कर दी और गढ़ को घेर लिया लेकिन राजपूतो के साहस से आठ महीने होने के बावजूद खिलजी को यश नही मिला.उसके बाद खिलजी ने रतनसिंह को संदेश भेजा कि , ” अगर मुझे रानी पद्ममवती के दर्शन मिल जाये तो मैं अपने राज्य दिल्ली लौट जाऊंगा” प्रजाहित के लिए रतनसिंह ने खिलजी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. परंतु रानी पद्ममवती खिलजी के कूटनीति को समझ चुकी थी इसलिए उन्होंने खुद सामने न जाकर आईने से अपना प्रतिबिंब दिखाने की सूचना दी.

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उस प्रकार रानी पद्मावती का प्रतिबिंब देखते ही खिलजी और पागल हो गया.”अतिति देवो भव” की भावना का पालन करते हुए रतनसिंह गढ़ के दरवाजे तक गए. इससे खिलजी को मौका मिल गया उसने अपने सैनिकों द्वारा राजा को कैद कर उसे अपने ठिकाने पर ले गए और संदेश भिजवाया “अगर आपको रतनसिंह जिंदा चाहिए तो आपको पदमावती को हमे सौपना होगा.”

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क्या किया रानी पद्मावती ने?

जैसे ही रानी तक यह संदेश पहुचा तो गढ़ से संदेश भिजवाया गया कि ” रानी अपने पचास दासियों के साथ अल्लाउद्दीन के डेरे में दाखिल होंगी, लेकिन उसके बदले में राणा रतनसिंह को छोड़ना होगा”. कहेनुसार रानी और उनकी दसिया एक एक पालकी में और उनकी पालकी उठानेवाले चार भोई खिलजी के डेरे तक पहुचे
रानी पद्मावती की पालकी खिलजी के शामियाने के सामने रुकायी गयी. राणा रतनसिंह को छुड़ाकर घोड़े पर बिठाया गया. पद्मावती के पालखी से एक स्त्री उतरी. अन्य पचास पालखी में से और दसिया भी उतरी. संकेत हुआ और…. और ये क्या? शण भर में पद्ममवती, उनकी दसिया और भोईयो नेपालखि में छुपाई हुई तलवारे सहलने लगी. रानी के मामा जिन्होंने पद्मावती का भेष किया था और उनके जेठ बदल. के सैनिक स्त्री भेष बनाकर खिलजी के डेरे में घुस गए थे. कुछ ही देर में कत्लेआम शुरू हो गया. गोरा तो खुद खिलजी के डेरे मे घुस गया लेकिन खिलजी ने दासी को आगे कर दिया राजपूत औरोतो पर हाथ नही उठाते जिससे खिलजी के सैनिकों ने गोरा का सर धड़ से अलग कर दिया.अपने स्वामी के प्राण बचाने के लिए गोरा ने अपने प्राण त्याग दिए. इसके बादल व अन्य राजपूत सैनिक राणा को लेकर गढ़ पर चले गए और खिलजी हाथ मलते रह गया.

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अब मात्र इस घटना से खिलजी बहुत ही गुस्साए था कुछ दिन गढ़ को झूझने के बाद रसद खत्म हो रही थी और अंतिम युद्ध के राणा रतनसिंह व राजपूत वीर सिद्ध हुए. 25 अगस्त 1303 को गढ़ का दरवाजा खोल, ” जय एकलिंग, जय महाकाल” के नारे लगाकर राजपूत सेना खिलजी की सागर की तरह सेना से भिड़ गयी. परंतु संख्या में कम होने के कारण लड़ाई का निर्णय आया एक एक राजपूत सैनिक पर खिलजी के दस दस सैनिक टूट पड़े और एक कार सब मरते गए. लड़ाई खत्म हुई और राणा के साथ सभी राजपूत मारे गए. और जो खिलजी के भूखे भेड़िये थे उन्हें लगा हमे सोला हज़ार राजपूत जननयी का शिकार मिलेगा, इसलिए वो गढ़ में घुस गए.

खिलजी के सैनिक गढ़ में घुसे?

लेकिन जैसे ही खिलजी के सैनिक गढ़ में घुसे तो उन्हें वह एक भी स्त्री नही दिखाई दी. थोड़ा आगे जाने पर उन्होंने देखा कि चितौड़गढ़ का जगप्रसिद्ध ” विजयस्तम्भ” पार करते ही देखा तो अनंतजवाला आकाश की और अग्निकी ज्वाला भभक रही थी.

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राजपूतो के हार का समाचार मिलते ही ख़िलजी के सैनिकों के गढ़ में घुसने से पहले ही रानी पद्मावती और उनके सोला हज़ार सहस्त्र वीरांगनाओ ने अग्नि को साक्षी मानअपने प्राण त्याग अग्नि में कूद गए. इस प्रकार अपने देव, धर्म कर्तव्य इज्जत को बचाने के लिए रानी पद्मावती अपने सोलह हजार वीरांगनाओ के साथ जौहर कर लिया.

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जो आज “जौहर स्थल” के नाम से मशहूर है. यह एक अलौकिक जौहर का सोलह और यह जौहर युगों युगों तक याद किया जाएगा.

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