उसका इस कदर रूठना, सांसे थमने से कम नहीं था

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जो डर हर प्यार में होता है, वो आख़िरकार मेरे दहलीज़ पर दस्तक देने आ ही गया था। अक्सर खुशहाल भरी ज़िंदगी में तीसरी का नहीं होना चाहिए। पति-पत्नी और वो के ही तर्ज पर प्रेमी-प्रेमिका और वो वाली बात कब हमारे दिलकश लम्हों के बीच अपना घर बना ली, यह अनजाने में पता ही नहीं चला। मगरूरियत हर इश्क में होती है, जैसा कि कहा जाता है कि “इश्क़ और जंग में सब जायज़ है।” यहां जंग नहीं थी किसी से लेकिन जंग का मैदान सज चुका था। शतरंज़ की बिसात बिछ गई थी। वक़्त अपनी चाल चलने को बेताब था। और यहां वक़्त का मोहरा बना मेरा अपना प्यार।

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इसमें गलती मेरी ही थी। मुझे इसका एहसास बख़ूबी था। कल तक अपनी ईमानदारी को दूसरे से दग़ाबाज़ी न होने तक की गुलामी का ढिंढोरा पीटने का दावा करने वाला आज खुद अपनी ही ईमानदारी को दांव पर लगा बैठा था। खैर हुआ यूं कि पिछले 90 दिनों के उसके प्यार ने वो सारे ख़्वाबों को पूरा होते देखने की चाहत तक का ही सफ़र तय किया था कि एक गोरी मेम के चक्कर में मैंने अपनी ईमानदारी को ही नीलाम कर दिया। हालांकि इसका संबंध हमारे पवित्र रिश्ते से नहीं था। गोरी मेम और मैं पिछले 1 वर्षों से ऑनलाइन फ़्रेंडशिप की औपचारिकता निभा रहे थे।

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इस दौरान सात समंदर पार बैठी उस मेम के लिए थोड़े बहुत दिली जज़्बात दिल में बन गए थे। 90 दिनों के प्यार के पहले गोरीमेम से ही थोड़ी बहुत गुप्तगू हो जाया करती थी। जीने मरने की कसमें भी खाई जाने वाली ही थी कि 90 दिन पहले ही मेरी ज़िंदगी की वो मांगी मुराद मुफ़्त में मिल गई, जिसके लिए लोग मंदिरों और मज़ारों की सीढ़ियां चढ़ते-उतरते अपने घुटनों में रगड़ निर्माण कर डॉक्टरों की फीस बढ़वा रहे होते हैं। खैर मैं खुशनसीब था और खुद को इस मामले में मुक़द्दर का सिकंदर मानता भी हूँ कि मुझे दस साल बाद ही सही मेरे प्यार के मामले में देर आए दुरुस्त आए वाली कहावत यथार्थ हो गई थी।

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बेइंतेहा मुहब्बत थी उससे। वो भी इस बात से वाकिफ़ थी परंतु मुक़द्दर की दग़ाबाज़ी का डर उसे सताता ज़रूर था। कई मर्तबा इस बात का इज़हार भी कर चुकी थी वो। मैं इन सब से बेख़बर जाने-अनजाने में दो नावों पर पैर रख अपनी क़िस्मत नीलाम करने चल पड़ा था। पिछले नब्बे दिनों से उस गोरीमेम से कोई ख़ास बात-चीत नहीं हुई थी, लेकिन फुर्सत में आराम फरमाते इतवार के दिन उस गोरी का फ़ोन आया। काफी देर वीडियो चैट हुई। फिर कुछ मैसेज हुए इस दौरान उसने शादी की बात पूछ ली कि “कब करोगे शादी मुझसे।” ? मैं भी इस बात से बेख़बर था कि आपकी करनी का फल भुगतने पड़ोसी नही आएगा।

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उसका दिल रखने के लिए उसके शादी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। मेरी सरज़मी से सात समंदर पार बैठी उस नादान को नहीं पता था कि जिस प्लॉट पर उसकी नज़र है वहां किसी और कि ईमारत का काम शुरू होने जा रहा है। नींव खोदी जा चुकी हैं। इन सब बातों के बीच गोरी मेम ने मेरी वाली से मार्क ज़करबर्ग के हथियार(फेसबुक) इस्तेमाल करते हुए संपर्क साध लिया। मैं यहाँ अपनी मस्ती में मस्त था। होनेवाली अनहोनी से अंजान। अगली सुबह ऑफिस पहुंचा ही था कि मेरे फ़ोन कर मैसेज की सुनामी आ धमकी।

कुछ समझ पाता कि गोरीमेम ने अपना जुगाड़ सेट करने के लिए उसका काम तमाम कर दिया था। अब वो मुझपर गोरी मेम के मसले को लेकर टूट पड़ी थी। इतने मैसेज आ चुके थे कि पढ़ने के पहले दोनों ने ब्लॉक कर दिया था। कही से अपनी सफ़ाई पेश करने का मौका ही नहीं हाथ लगा। मैं धड़ विहीन कुछ समझ पाता , कुछ कर पाता तबतक तो सारे रास्ते बंद हो चुके थे। मेरे हाथ-पैर कम्पन का शिकार हो चुके थे मानो भूचाल आ गया हो। पैरों तले जमीन खिसक चुकी थी। एक पल लगा मानो हृदयगति इतनी रफ्तार से तेज़ हो चली है कि कहीं इसपर विराम ही न लग जाए।

ऐसा लगा मानो सांसे थमने लगी हैं। आंखों के आगे अफ़सोस और बेवकूफ़ी के दृश्य दिखाई पड़ने लगे थे। समझ ही नहीं आ रहा था क्या किया जाए। कहाँ जाया जाए। मैं हताश था। कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें। तभी अचानक मेरे फ़ोन की घन्टी बजी। वही जाना पहचाना दस अंकों का मोबाइल नम्बर , हिम्मत नहीं हो रही थी फ़ोन उठाने की। फिर सोचा अब गुनाह तो हो ही गया है तो सजा का हक़दार तो होना ही पड़ेगा। लेकिन उसका एक मैसेज इतना भयावह था, “हमारा साथ यही तक था। आज से तुम आज़ाद , मुझे सब मंज़ूर है लेकिन धोका नहीं। आज के बाद मुझसे बात करने की कोशिश मत करना, गुडबाय।”

इसे पढ़ने के बाद किस मुहँ से फ़ोन उठता, लेकिन कहते हैं ना इश्क़ और ज़ंग में सब जायज़ है। मैंने फ़ैसला कर लिया था अपनी बेगुनाही साबित करने का। इस मामले में मुल्ज़िम और गवाह मैं ही था। सहसा हिम्मत बांध उसे फ़ोन किया, घन्टी बजी सामने से करुणाभरे क्रोधित स्वर में आवाज़ आई, “सब खत्म हो गया अब…….To be continue…

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