उसकी उस आवाज़ का ही जादू था जो रात भर जागने पर मजबूर कर दिया था

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इसी कशमकश में ये सोच कर मन आगे पीछे हो रहा था कि उसे फ़ोन किया जाए या नहीं। दिमाग में उठतें अदृश्य सवालों ने परेशान कर रखा था। ऑफिस में बैठ कर कॉल करना मुनासिफ नहीं लगा। इसके पीछे कारण थे, ऑफिस में लगी तीसरी आँख ( सीसीटीवी, कैमरा), काफी देर तक सोच-विचार करने के बाद उसे वीडियो कॉल करने का मन बनाया गया। हाथ बंधी घड़ी में दोपहर के तक़रीबन दो बजे होंगे,सहसा उठ निकल पड़ा ऑफिस के बाहर जाने के लिए। सोचा किसी ऐसे स्थान को चुना जाए जहाँ नेटवर्क की समस्या को झेलना ना पड़े। वैसे भी हम दैनिक जीवन में सुबह-से लेकर शाम तक बहुतों को झेलते ही हैं। हमारी इसी झेलने की अच्छी आदत ने आज हमारे साथ-साथ देश का भट्टा बिठा दिया खैर… बात हो रही थी उसे कॉल करने की…घबराये मन ने उसे कॉल किया वो भी  वीडियो कॉल।

चूँकि दोपहरिया थी। पास में ही बने पार्क के गेट के पास खड़े होकर उसके फ़ोन उठाने का इंतज़ार हो ही रहा था कि अचानक नज़र के सामने एक चेहरा नजर आया। मोबाइल की स्क्रीन मानो चमक उठी। एक पल लगा मानो खुद पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। उसे एकबारगी देखने पर लगा मानो कोई अदृश्य शक्ति जो चेहरे पर लालिमा लिए नज़र आ रही हो। उसके मुख पर जो तेज़ था उसे देख कर मानो यूँ लगा जैसे सुबह उगते सूरज की मध्यम किरणें प्रकाशवान हो रही हो। आँखों में गज़ब की गरिमा थी, देख कर यूँ लगा मानो इन आँखों में अथाह समुन्दर समाया हो, ओठों की कातिलाना मुस्कान तो कयामत को दावत देती नज़र आ रहीं थी। केशों को देखकर लगा मानो पूर्णिमा अपनी तय समय सीमा भूल गयी है और अब तो अमावस की राज होने जा रहा हैं। इसी बीच आँखों को एक टक लगाए उसके चहरें में अचानक हलचल हुई और होठों ने मानो कुछ हरकत सी करने की कोशिश की ही थी कि मेरे कानो पर एक आवाज़ गूँजी। जी हां बिलकुल वहीँ आवाज़ थी वो जिसने मुझे कई रातें जगाये रखा था। कभी ऐसा लगता था भला सुबह ही होती क्यों है।

एक आवाज़, हाय…….कैसे हो आप? मुझे ही देखना चाहते थे आप…. लो मैं ही हूँ वो जिसने आपका चैन चुरा रखा है। उसके बाद वो बोलते ही जा रही थी और मेरी दोनों इन्द्रियां बस उसे देख और सुन रही ही थी कि अचानक समय ने बेरहमी दिखानी शुरू कर दी। अपनी वार्ता को वही अधूरा छोड़, दोबारा फिर फ़ोन करने का आश्वासन देकर ,वहां से ऑफिस की ओर चल पड़ा।

उस दिन बहुत खुश था मैं। मानो अनमोल संपदा बैठे बिठाये ही मिल गयी थी। ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा कि किसे बताऊँ? शाम को ऑफिस से छूटने की जल्दबाज़ी और उसके फ़ोन का इंतज़ार, सोच तो वो भी यही  रहीं थी कि पता नहीं उसे पसंद आयी भी कि नहीं। दोनों के विचार उस वक़्त सामान दिशा में ही सोच रहें थे। बेचैनी और बेक़रारारी दोनों तरफ हिचकोले लगा रही थी। दोनों अपनी जगह थे भी सही, दोनों की पसंद न पसंद का सवाल जो था। इस पसंद न पसंद के पीछे छुपा था दोनों का स्वाभिमान, दोनों का आत्मसम्मान,दोनों का विश्ववास और इसके पीछे छुपा था दोनों का रूहानी इश्क़ जो समय के साथ परवान चढ़ रहा था। बात अब इस हद तक जा पहुंची थी कि अब तो साँसे यहाँ ली जाती तो दिल वहां धड़कता, ख्याल यहाँ आते तो बात जुबान पर उसके रहती। कुछ इस तरह का लगाव हो चुका था। समय बीते अभी महीना भी नहीं हुआ था लेकिन लग ऐसे रहा था मानो सदियों का प्यार हो जो कभी किसी कालखंड में परवान ही नहीं चढ़ सका।

इसी विचारों ने कुछ देर तक उलझाए रखा था कि इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कब मेरे फ़ोन पर एक कॉल ने दस्तक दे दी थी। वही जाना-पहचाना नंबर था। वही आखिरी दो अंको का जादुई आकंड़ा जिसे देख कर उदास मन खुश हो जाया करता था। देर ना लगाते हमने भी उस मखमली आवाज़ से अपने कानो को सुकून देने के लिए फ़ोन लगा दिया ………To be continue

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