एक “वह” जिसके लिए धड़कने भी रूठने लगी हैं

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वैसे तो मैं सोशल मीडिया का ज्यादा उपयोग नहीं करता, यदाकदा ही फेसबुक पर फेस दिखाने आ जाते हैं। यही कोई 6 दिसंबर के एक पोस्ट पर हमने भी अपनी शेखी बघारने के चलते कमेंट करने की तौहीन कर दी। सार्वजानिक तौर पर कही गई मेरी बात उसे नागवार गुजरी, सोचा क्यों न मैसेंजर का लाभ लिया जाये और अपनी गलतफहमी का स्पष्टीकरण दे दिया जाये। पहली बार कांपते हाथों से निर्भीग होकर उसे मैसेज किया। नाम भी बड़ा अजीब सा था, समझ नहीं आ रहा था, यह पुरुष महिल बन कर क्यों छल रहा है।

हमने सोचा हमे कौन सा रिश्तेदारी निभानी है। सो दे दी सफाई, कुछ देर के वार्तालाप के बाद ज्ञात हुआ कि वह तो पड़ोस के जिले की निकली, फिर बेख़ौफ़ होकर इसलिए बात करते रहे की वह कुछ भी हो ब्राह्मण है पड़ोस के जिले की है, भला न सही बुरा भी नहीं करेगी,

उसकी तस्वीरें देख लगा ही नहीं की साढ़े तीन दशक देख चुकी होगी , ऐसा लग रहा था मानो अभी-अभी स्नातक पूरा कर काम की तलाश करती कोई 20 या 22 वर्ष की लड़की हैं। बातों-बातों में एक दूसरे के कांटेक्ट डिटेल्स आदान-प्रदान हुए। एक्का दुक्का रोज रात रानी की कृपा दृष्टि से आधी-आधी रात तक बातें होती रही, रात रानियों को बेचैन करनेवाली इस बात के दौरान उससे अजीब सा अपनापन का अहसास होने लगा।

धीरे-धीरे जरुरी औषध की तरह वह जरुरी लगने लगी।  सभी कामों को दरकिनार कर जेहन में उसी के ख्याल आने लगे। सोचा होता है, लेकिन एक अनजाने व्यक्ति के लिए इतना जज्बाती होना सही भी नहीं, क्या पता होनेट्राप हो। चंचल मन को दफा रोकने में नाकमयाब रहा, दिल था की बस उसी की लगन में लगा रहा। विश्वास को कोसों दूर छोड़ आँख मूंदे इतना लगाव हो गया था कि सोचने की क्षमता भी बौनी लगने लगी थी, था ही कुछ ऐसा उसका जादू।

कई दफा इश्क़ की गिरफ्त में आने की कोशिश की पर हर बार नाकमयाब रहा, लेकिन इस बार खुद ही हाथ आगे किये गिरफ्तार होने चल पड़े थे। फिर एक दिन रोज की तरह ऑफिस में स्टोरी की माथापच्ची लगी थी कि अचानक फ़ोन की घंटी बजी, देखा तो मेरी कांटेक्ट लिस्ट में मौजूद नंबरों की सूची से अलग नंबर बेताब था कि मैं उसे पिक करूँ, काम का जोर था कि अनदेखा करना पड़ा। दोबारा फिर उसी नंबर की हिमाकत हुई मेरे फ़ोन को छेड़ने की।

सोचा शाम को ऑफिस से छूटते वक़्त इससे हिसाब किताब करूँगा। जैसे ऑफिस से निकला उस अनजान नंबर पर मेरी उंगलिया टूट पड़ी.. सामने से एक आवाज़ मेरे कानों में गुंजी हम बोल रहे है, फलां जगह से, दोबारा क्रॉस चेक किया, वहीँ डायलॉग, “हम” बोल रहे हैं, कोने में बैठी यादाश्त अचानक फुर्ती के साथ बोल पड़ी अच्छा “आप”? उसकी आवाज़ में मानो कोई 16 साल की लड़की हो जो अभी-अभी बोर्ड का इंतिहान देकर लौटी हो और नजाकत भरे लहजे में हँसते हुए बोल पड़ी, हाँ हम ही हैं।

तक़रीबन 8 मिनट हुई उस बातचीत को आज  भी नहीं भूल पाया हूँ, मेरे कानों को एक शराब की तरह लत लग गयी हैं कि उसे दोबारा सुनने की। पता नहीं ऐसी कौन सी बात थी उसमें जिसने मुझ जैसे वैरागी को अपने वश में वशीभूत कर लिया। इसे प्यार नहीं कह सकते, इसे क्या नाम दे समझ नहीं आ रहा है, आज भी पल-पल, उसकी आवाज़ मेरे जेहन में गूंजती है।जितना सोचता हूँ भूल  जाऊं , उतना ही याद आने लगी है। अब तो रब से भी शिकायत होने लगी है कि ये दिन 24 घंटे का ही क्यों बनाया? अब तो धड़कने भी रूठने लगी हैं कि जब तक उसका दीदार न होगा तब तक ऐसे ही माध्यम-माध्यम गति से चलेंगे और चलते रहेंगे।

शिवकुमार…….

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